पिछले दिनों ग्रेट श्याम बेनेगल की दो फिल्में देखी,
निशांत और अंकुर,
हाँलाकि सही यह होता कि अंकुर देखने के बाद निशांत देखी जाती ,
बेनेगल ने यह दो फिल्में क्रमशः इसी क्रम में बनाई थी,अंकुर 1973 में आई थी,और निशांत 1975 में,
यही दो फिल्में इसी क्रम में बेनेगल की पहली और दूसरी फिल्म भी थी,
बतौर कापीराइटर अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले बेनेगल , अंकुर से पहले कुल बहत्तर डाक्यूमेंट्रीज के साथ करीब तब तक आठ सौ एड़फिल्म्स बना चुके थे,साथ ही एफ टी आई में अध्यापन का एक दौर भी उनके खाते में जमा था,
1967 में आई उनकी डाक्यूमेंट्री ए चाइल्ड़ आफ द स्ट्रीट्स
काफी पसंद की जा चुकी थी,
बारह साल की उम्र में पहली बार कैमरा पकड़ने वाले बेनेगल की 1973 में आई पहली फिल्म अंकुर का उतना कसा हुआ होना ही था जितना की संगीतज्ञ के लिए कसा हुआ वीणा का पारंगत तार होता है ,
अंकुर,यह फिल्म बेनेगल का एकांत नृत्य है,जिसमें नवांगतों की एक पूरी पौध है,नए मगर थियेटर में मंजे हुए,आंध्रा के गांव में 1950 के समय में घटी एक वास्तविक घटना का मनौवैज्ञानिक विश्लेषण करता,सफल चित्रण,
हैदराबादी लहजे से झंकृत दक्खिनी बोली,वैसा ही परिवेश जैसे यह फिल्म बेनेगल में रची बसी हो,
फिल्मकास्ट का एक और सबसे अधिक पाजिटिव पाइंट रही शबाना,जिन्होंने इस फिल्म में आदिवासी युवती लक्ष्मी के चरित्र अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता,
शबाना, बेनेगल की इस भावभूमि में पिघलें सोने की तरह उतरती है,पीली साड़ी,तीखे नैन,नक्श,माथे पर सिंदूरी सूरज और दिलकश चितवन,जो आदिवासियों में देखने में नहीं आता
बेनेगल , अंकुर में जो कोलाज खींचते हैं वह एक अकश साँवला सौंदर्य रहना था,केवल जीवंत आंखों वाला ,नरम नाजुक,कर्मठ,
एक ज़मीदार का लड़का जो बेमन से अपने खेत की देखरेख में जोत दिया गया है,अपनी यौनिक कुंठाओं,आदर्श जीवन,और प्रतिकार की नीयत का प्रतिनिधित्व करते युवा के बरक्स लक्ष्मी एक बहुत मामूली रूप सौंदर्य का वहन करती सी लगनी थी,उसी उत्स को भी ग्रहण करता युवक,मन पर सीधा प्रभाव ड़ालता,
शबाना बेहद अ बेनेगल चुनाव था,मगर शबाना ने यह कमी अपने चरम अभिनय से पूरी कर दी,फिल्म शबानामय हो चली और यहीं पर सांत्वना का प्रभाव अनूकूल बन पड़ता है,
हम एकाएक लक्ष्मी के पक्ष में होते जाते हैं,लक्ष्मी जो जात कुम्हार हैं, गूंगे बहरे पति से बंधी ब्याही है, बैऔलाद है,एक परित्यक्त गर्भजा है,करीब करीब कुलटा है चोर है मगर सदोष होकर भी न्याय की अधिकारिणी है,
अंनंत नाग प्रेमी होकर भी भयग्र्स्त कुटिल चोर साबित होते हैं , और अंत में बंद दरवाजे के पीछे स्वदोष पश्चाताप पर बच्चों की तरह रोते हैं , जो फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य बन पड़ा है,
गहरे जातिवाद पर भरपूर कटाक्ष के बाद भी बेनेगल इसे अपनी मनोविज्ञानिक समझ और भावुकता से अलग नहीं होने देते,यह उनकी मास्टर क्लास है,
और लगभग यही वजह अंकुर और निशांत के बीच का पृथ्थकरण है,
निशांत एकांतिक बेनेगल कोलाज नहीं हैं,ना ही एकांतिक शबानामयी प्रभाव,निशांत के कईं फलक है
एक विस्तृत लैंड़स्कैप है,एक जटिल चित्रण,
अंकुर ,जैसे पहाड़ो के बीच बहती एक स्त्री कथा है,
जिसके दो समांतर लगभग समान पुरूष किनारें हैं एक प्रौढ़ जमींदार और उसका युवा पुत्र,
जबकि निशांत बदलाव की कथा है ,निशांत का अंत एक सामूहिक हत्याकांड़ में परिणित है वहाँ जो अगले सवेरे बचता है वह एक बदला समाज है,जिसके लिए वह फिल्म हैं,मगर निशांत पर इतने से ही बात खत्म नहीं की जा सकती है,
अंकुर आँखों में समाने वाली फिल्म है,वहाँ कोई कल्पित विस्तार की गुंजाइश नहीं,
बेनेगल किसी घाटी के दृश्य की तरह उसे पूर्ण खींचते हैं,
बेनेगल ,लगभग एक से चित्रण के बावजूद दो अलग फिल्में ,दो अलग विस्तार और दो अलग चमत्कार हमारे सामने रखते हैं,
निशांत , को बेनेगल के एकांत से जो चीज बाहर खींचती है, वह है , निशांत में विजय तेंदुलकर लिखित स्क्रीन प्ले का होना ,जिन्होंने बाद में आक्रोश और अर्धसत्य का स्क्रीन प्ले भी लिखा...निशांत को, विजय के तेवर मिले हैं ,
बेनेगल के साथ ही उनकी अपनी छटा,
क्रमश:
किंशुक शिव
निशांत और अंकुर,
हाँलाकि सही यह होता कि अंकुर देखने के बाद निशांत देखी जाती ,
बेनेगल ने यह दो फिल्में क्रमशः इसी क्रम में बनाई थी,अंकुर 1973 में आई थी,और निशांत 1975 में,
यही दो फिल्में इसी क्रम में बेनेगल की पहली और दूसरी फिल्म भी थी,
बतौर कापीराइटर अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले बेनेगल , अंकुर से पहले कुल बहत्तर डाक्यूमेंट्रीज के साथ करीब तब तक आठ सौ एड़फिल्म्स बना चुके थे,साथ ही एफ टी आई में अध्यापन का एक दौर भी उनके खाते में जमा था,
1967 में आई उनकी डाक्यूमेंट्री ए चाइल्ड़ आफ द स्ट्रीट्स
काफी पसंद की जा चुकी थी,
बारह साल की उम्र में पहली बार कैमरा पकड़ने वाले बेनेगल की 1973 में आई पहली फिल्म अंकुर का उतना कसा हुआ होना ही था जितना की संगीतज्ञ के लिए कसा हुआ वीणा का पारंगत तार होता है ,
अंकुर,यह फिल्म बेनेगल का एकांत नृत्य है,जिसमें नवांगतों की एक पूरी पौध है,नए मगर थियेटर में मंजे हुए,आंध्रा के गांव में 1950 के समय में घटी एक वास्तविक घटना का मनौवैज्ञानिक विश्लेषण करता,सफल चित्रण,
हैदराबादी लहजे से झंकृत दक्खिनी बोली,वैसा ही परिवेश जैसे यह फिल्म बेनेगल में रची बसी हो,
फिल्मकास्ट का एक और सबसे अधिक पाजिटिव पाइंट रही शबाना,जिन्होंने इस फिल्म में आदिवासी युवती लक्ष्मी के चरित्र अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता,
शबाना, बेनेगल की इस भावभूमि में पिघलें सोने की तरह उतरती है,पीली साड़ी,तीखे नैन,नक्श,माथे पर सिंदूरी सूरज और दिलकश चितवन,जो आदिवासियों में देखने में नहीं आता
बेनेगल , अंकुर में जो कोलाज खींचते हैं वह एक अकश साँवला सौंदर्य रहना था,केवल जीवंत आंखों वाला ,नरम नाजुक,कर्मठ,
एक ज़मीदार का लड़का जो बेमन से अपने खेत की देखरेख में जोत दिया गया है,अपनी यौनिक कुंठाओं,आदर्श जीवन,और प्रतिकार की नीयत का प्रतिनिधित्व करते युवा के बरक्स लक्ष्मी एक बहुत मामूली रूप सौंदर्य का वहन करती सी लगनी थी,उसी उत्स को भी ग्रहण करता युवक,मन पर सीधा प्रभाव ड़ालता,
शबाना बेहद अ बेनेगल चुनाव था,मगर शबाना ने यह कमी अपने चरम अभिनय से पूरी कर दी,फिल्म शबानामय हो चली और यहीं पर सांत्वना का प्रभाव अनूकूल बन पड़ता है,
हम एकाएक लक्ष्मी के पक्ष में होते जाते हैं,लक्ष्मी जो जात कुम्हार हैं, गूंगे बहरे पति से बंधी ब्याही है, बैऔलाद है,एक परित्यक्त गर्भजा है,करीब करीब कुलटा है चोर है मगर सदोष होकर भी न्याय की अधिकारिणी है,
अंनंत नाग प्रेमी होकर भी भयग्र्स्त कुटिल चोर साबित होते हैं , और अंत में बंद दरवाजे के पीछे स्वदोष पश्चाताप पर बच्चों की तरह रोते हैं , जो फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य बन पड़ा है,
गहरे जातिवाद पर भरपूर कटाक्ष के बाद भी बेनेगल इसे अपनी मनोविज्ञानिक समझ और भावुकता से अलग नहीं होने देते,यह उनकी मास्टर क्लास है,
और लगभग यही वजह अंकुर और निशांत के बीच का पृथ्थकरण है,
निशांत एकांतिक बेनेगल कोलाज नहीं हैं,ना ही एकांतिक शबानामयी प्रभाव,निशांत के कईं फलक है
एक विस्तृत लैंड़स्कैप है,एक जटिल चित्रण,
अंकुर ,जैसे पहाड़ो के बीच बहती एक स्त्री कथा है,
जिसके दो समांतर लगभग समान पुरूष किनारें हैं एक प्रौढ़ जमींदार और उसका युवा पुत्र,
जबकि निशांत बदलाव की कथा है ,निशांत का अंत एक सामूहिक हत्याकांड़ में परिणित है वहाँ जो अगले सवेरे बचता है वह एक बदला समाज है,जिसके लिए वह फिल्म हैं,मगर निशांत पर इतने से ही बात खत्म नहीं की जा सकती है,
अंकुर आँखों में समाने वाली फिल्म है,वहाँ कोई कल्पित विस्तार की गुंजाइश नहीं,
बेनेगल किसी घाटी के दृश्य की तरह उसे पूर्ण खींचते हैं,
बेनेगल ,लगभग एक से चित्रण के बावजूद दो अलग फिल्में ,दो अलग विस्तार और दो अलग चमत्कार हमारे सामने रखते हैं,
निशांत , को बेनेगल के एकांत से जो चीज बाहर खींचती है, वह है , निशांत में विजय तेंदुलकर लिखित स्क्रीन प्ले का होना ,जिन्होंने बाद में आक्रोश और अर्धसत्य का स्क्रीन प्ले भी लिखा...निशांत को, विजय के तेवर मिले हैं ,
बेनेगल के साथ ही उनकी अपनी छटा,
क्रमश:
किंशुक शिव
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